एक शहर से दूसरे शहर
एक गांव से दूसरे गांव
अब इस शहर को छोडने का वक्त भी आ गया
कहते है आजकी दुनिया एक ग्लोबल व्हिलेज बन गयी है
शायद सच भी हो
लेकिन जज्बातों की छोटीसी दुनिया का क्या?
किसी शहर से गहरा नाता जुडता है
किसी दूसरे से सिर्फ पहचान होती है
लेकिन इस के बीच घर शब्द का अर्थ कहीं छूट सा जाता है
बचपन में पढा था
गोगली अपना घर अपनी पीठ पर लेकर घूमती है
उस समय कितना अचरज हुआ था
उस समय ये कहां पता था
कि किसी दिन
हम भी इस ग्लोबल व्हिलेज की एक गोगली बन जायेंगे
अपना घर अपनी पीठ पर लिये
एक शहर से दूसरे शहर
एक गांव से दूसरे गांव
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6 comments:
bahut sahi kaha...main abhibhi kah nahi pata ki "I live here", "I stay here" aisehi nikalata hai muh se...sahi ya galat pata nahi..par sach hai...good one!
lagata hai yeh jajbaat dojhara raha hoon. piChale saal bhi kuCh aisaahi likha tha. ghar shabda ki vyaakhya nahi kar paya tha.
a bit depressing.
kavita chan aahet....
dhanyavaad Prajkta!
very nice - very apt :)
- Aparna
Thanks, Aparna. :)
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