Saturday, 8 March 2008

एक बेकारसा दिन

एक बेकारसा दिन

धीमी बारिश में भीगासा दिन
गीली ठंड से सिकुडतासा दिन
काले बादलोंकी छांव में मुरझायासा दिन
तेज हवा के थपेडोंसे परेशानसा दिन
अंदर की कश्मकश से बेचैन सा दिन
अनजान मंझिलोंकी राह में
अनदेखे दिनोंकी आहट में
ग़ालिब को याद करता हुआ

एक बेकारसा दिन

4 comments:

a Sane man said...

ye anokha sanjog hai...kal idhar bhi kuchh aisahi mahol tha...isliye har ek shabd mahsoos kar paya...bahut khoob!

Raj said...

शुक्रिया, a sane man. ऐसा लगता है के ये योरोप-अमरिकाके मौसम का परिणाम है. शायद इसीलिए ये लोग सूरज को देखने के लिए तडपते रहते है.

a Sane man said...

हाँ...और एक वजह शायद यह भी है की, सूरज भी अजीब है‍| कभी कभी सिर्फ रोशनी देता है, गर्मी शायद भूल जाता है| :-)

Raj said...

लाख पते की बात. अरे का बताई बाबू. जबसे यहां आए है ई सूरजवां की गर्मी देखने को तरस गए है. :-)