आते है गैब से ये मजामिन खयाल में, गालिब सरीर-ए-खामा नवा-ए-सरोश है
कुछ तो पढीये के लोग कहते है आज गालीब गजलसरा न हुवा
बहोत खूब, हरेक्रिष्णजी.
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कुछ तो पढीये के लोग कहते है
आज गालीब गजलसरा न हुवा
बहोत खूब, हरेक्रिष्णजी.
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