रविवार की सुबह. हम लोग टीवी स्क्रीन पर अपनी नजर टिकाए हुए.
और नजर आता है एक गुलाब का फूल. साथ में गंभीर आवाज में ऋग्वेद के नासदिय सूक्त के मंत्रोच्चार.
सृष्टी से पहले, सत नही था, असत भी नही
अंतरिक्ष भी नही, आकाश भी नही था
छिपा था क्या, कहां, किसने ढका था
उसपल तो अगम अतल जल भी कहाँ था?
सृष्टि का कौन है कर्ता, कर्ता है वा अकर्ता
उँचे आकाश में रहता, सदा अध्यक्ष बना रहता
वही सचमुच है जानता, या नहीं है जानता
यह किसी को नहीं पता, नहीं है पता
वेदों के लिखे जाने की निश्चित तिथी आज भी मालूम नही है. कमसे कम तीन हजार वर्ष पूर्व का अनुमान निकाला जाता है. सोचने वाली बात है, जब करीब करीब सारी मानवजाती (कुछ अपवादों को छोडकर) अपनी रोज की समस्याओं से जूझ रही थी, उसी समय हमारे पूर्वज इस सृष्टी का उगम कैसे हुआ, इसका कोई कर्ता है या नही ऐसे गहन प्रश्नों के जवाब खोजने में लगे हुए थे. ऐसे प्रश्न जिनके जवाब आज भी उतनेही महत्त्वपूर्ण है.
Sunday, 25 November 2007
Friday, 16 November 2007
नींद
दिन भर के मसलों से जूझता हुआ
रात को थककर लेट जाता हूं
अनगिनत खयालों में फसां हुआ
याद करता हूं अतीत को
सोचता हूं भविष्य में
हासिल कुछ नही होता
खयालों की गुत्थी उलझती ही जाती है
और फिर किसी पहर खो जाता हूं
चंद घंटाँ के लिये नींद के आगोश में
फिर दूसरे दिन सामना होगा
उन्ही मसलों से,
कुछ नए होंगे, कुछ पुराने
मगर सोचता हूं किसी दिन
ऐसी नींद मिले
कि फिर किसी मसले की जरूरत ही न हो
रात को थककर लेट जाता हूं
अनगिनत खयालों में फसां हुआ
याद करता हूं अतीत को
सोचता हूं भविष्य में
हासिल कुछ नही होता
खयालों की गुत्थी उलझती ही जाती है
और फिर किसी पहर खो जाता हूं
चंद घंटाँ के लिये नींद के आगोश में
फिर दूसरे दिन सामना होगा
उन्ही मसलों से,
कुछ नए होंगे, कुछ पुराने
मगर सोचता हूं किसी दिन
ऐसी नींद मिले
कि फिर किसी मसले की जरूरत ही न हो
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