Wednesday, 11 July 2007

मिर्ज़ाजी

प्रिय मिर्ज़ाजी,
मुझे पता है कि आपपर अबतक हजारोंने लिखा है, कई किताबें छप चुकी है. फिर मै ऐसा कौनसा तीर मारनेवाला हूं? जवाब मुझे भी मालूम नही. लेकीन ये जानता हूं की अगर नही लिखूंगा तो मन को शांती नही मिलेगी. पिछले दिनों ये सुनने में आया था की आप एक फॅशन बन गएं है. शायद सच भी हो. मुझे सिर्फ इतना पता है की कॉलेज में था तब आपसे पहली मुलाकात हुई. आपकी लब्जों का जादू, जो सर पर सवार हुआ अब तक उतरा नही. ऐसी बात नही है की औरों की शायरी पढी नही या अच्छी नही लगी. लेकीन आप की बात ही कुछ और है.

जब कि तुझ बिन नही कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है

कितनी आसान रचना है और इसके मतलब कितने हो सकते है. जब ऐसे शेर पढता हूं तो लगता है, आप से मिल पाता तो क्या होता? आपकी शायरी में आपका दर्द भी कितनी तीव्रता से महसूस होता है.

कहूं किस से मै के क्या है, शब-ए-गम बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता

जब ये पढता हूं तो आप की तनहा रातें मेरी हो जाती है, आपकी आंखों का आंसू मेरी आंख नम कर देता है. कई लोग इसे stupid sentimentalism कहते है. कहने दो, मुझे परवाह नही. अगर आप की शायरी पढ कर आंख नम होना
मूर्खता कहलाता है, तो मै अव्वल दर्जे का मूर्ख कहलाना पसंद करूंगा.

मिर्ज़ाजी, आपने जो मुझे दिया है उसका बयान शब्दों में करना मुमकिन नही. कितनी ही बार ऐसा लगा कि आप सिर्फ मेरे ही लिए लिख रहे है. धन्यवाद कहूंगा तो औपचारिक लगेगा, और अपने लोगों से औपचारिकता कैसी. बस एक ही रंज है कि आपसे कभी मिल नही पाया. आप की तरह मै भी नास्तिक हूं लेकीन मरने के बाद अगर आप से मिल सकता हूं तो इस बात के लिये मै दुनिया के किसी भी खुदा को मानने के लिए तय्यार हूं.

Monday, 2 July 2007

कहना उसे

फरहत शहजाद की रचनाएं पहली बार मेहदी हसनजी की आवाज में सुनी, अल्बम का नाम था कहना उसे. शहजादजी का कलाम अन्य शायरोंसे हटके महसूस होता है, इसका एक कारण शायद यह होगा की शहजादजी अपनी रचनाओंमें अलग तरह की प्रतिमाओंका (images) इस्तेमाल करते है. अल्बम में एक से एक चुनिंदा कलाम है. मेरा पसंदीदा शेर है

कोंपले फिर फूट आई शाख पर कहना उसे
वो न समझा है, न समझेगा, मगर कहना उसे

ऐसे खूबसूरत कलाम और उसपर मेहदी हसनजी की आवाज, सचमुच ये अल्बम एक बेहतरीन पेशकश है. पेश है मेरी एक पसंदीदा गझल.

खुली जो आंख तो वो था, न वो जमाना था
दहेकती आग थी, तनहाई थी, फसाना था

गमों ने बांट लिया है मुझे यूं आपस में
के जैसे मै कोई लूटा हुआ खजाना था

ये क्या के चंद ही कदमों पे थक के बैठ गए
तुम्हे तो साथ मेरा दूर तक निभाना था

मुझे जो मेरे लहूं में डबो के गुजरा है
वो कोई गैर नही, यार इक पुराना था

खुद अपने हाथ से, 'शहजाद' उसको काट दिया
के जिस दरख्त की टहनी पे आशियाना था