Thursday, 15 March 2007

तनहा

इन दिनों घर बदलने के चक्कर में हूं. पुरानी चीजों के ढेर में मिली कॉलेज के जमाने की डायरी. उस समय गालिब, गुलजार जैसी हस्तियों का दीवानापन सर पे संवार था. (वो अब भी बरकरार है और मरते दम तक रहेगा)

उसी डायरी में मिली एक 'ब्लू मूड' में लिखी हुई गझल.

तनहा सी एक शाम दिल में उतरती रही
एक धुंदली सी याद दिल को सताती रही

जिंदगी से कितनी ही बार मायूस हो गए
सूखी शाख पर कोंपले बारहा आती रही

सूकून नही मिला मंझिलें पाने के बाद
हर मंझिल दिल को और तनहा बनाती रही

जिंदगी तो कब की खत्म कर दी होती
हर बार रुह मेरी बनकर मसीहा आती रही