कभी आपने किसी बात का बरसों इंतजार किया हो और अचानक एक दिन वो आपको मिल जाए तो कैसा महसूस करेंगे? करीब दस साल पहले की बात है. ग़ालिब का कलाम, गुलाम अलीजी की आवाज. उन दिनों टेपरिकार्डर में कसेट पे सुना था. पहली बार सुनके जो महसूस हुआ वो बयान नही कर सकता. पिछले चार साल में इसकी एम्पी ३ ढूंढने की बहोत कोशिश की, मगर नाकाम रहा. फिर कल अचानक जनाब सांताजी मुझ पर मेहरबान हुए और ये रचना मिल गई.
शौक़ हर रंग रक़ीब-ए सर-ओ-सामां निकला
क़ैस तस्वीर के पर्दे में भी उर्यां निकला
ज़ख़्म ने दाद न दी तंगी-ए दिल की या रब
तीर भी सीनह-ए बिस्मिल से पर-अफ़्शां निकला
बू-ए गुल नालह-ए दिल दूद-ए चिराग़-ए मह्फ़िल
जो तेरी बज़्म से निक्ला सो परेशां निकला
दिल में फिर गिर्ये ने इक शोर उठाया ग़ालिब
आह जो क़तरा न निकला था सो तूफ़ां निकला
ग़ालिबकी बहोत सारी रचनाओं की तरह ये भी मुश्किल है. इसका अर्थ और विश्लेषण यहां मिल सकता है.


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