Wednesday, 10 October 2007
बरसन लागी सावन बुंदिया राजा
बहोत साल पहले ये दादरा गुलाम अलीजी की आवाज में सुना था. बादमें कई अंग्रेजी, हिंदी और मराठी गानोंकी भीड में कही खो गया था. परसों विश्वजालापर घुमते घुमते अचानक इस गाने की याद आई. भारतीय गानों के सभी विख्यात स्थल छान मारे, लेकीन इसका कोई पता नही था. बहोत देर घूमने के बाद एक जगह मिल ही गया. उसे फिर सुनते हुए ऐसा लगा जैसे किसी करीबी दोस्त को बरसों बाद मिल रहा हूं.
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4 comments:
waah...maine ye pahli bar suna hai...bahut achcha laga...Ghulam ali ki to baat hi kuchh aur hai!!...bahut shukriya ise blog ke saath joDane ke liye...
शुक्रीया आपका,इज्जत अफजाई के लिए. इसी तरह मै गुलाम अलीजी की एक और गझल ढूंढ रहा हू. कलाम गालिब का है,
शौक हर रंग रकीबे सरोसामा निकला
कैस तस्वीर के पर्दे में भी उरीयां निकला
गुलाम अलीजी ने कमाल का गाया है. पता नही कब मिलेगा!
क्या बात है ! जब मैने पहीली बार youtube मे कुमार गंधर्वजीका गाना ढुंड निकाला तब मै तो होशोहवाश ही खो बैठा !
हरेकृष्णजी,
आपने मेरे हालात बिलकुल सही शब्दोंमें बयान किये है.
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