Monday, 2 July 2007

कहना उसे

फरहत शहजाद की रचनाएं पहली बार मेहदी हसनजी की आवाज में सुनी, अल्बम का नाम था कहना उसे. शहजादजी का कलाम अन्य शायरोंसे हटके महसूस होता है, इसका एक कारण शायद यह होगा की शहजादजी अपनी रचनाओंमें अलग तरह की प्रतिमाओंका (images) इस्तेमाल करते है. अल्बम में एक से एक चुनिंदा कलाम है. मेरा पसंदीदा शेर है

कोंपले फिर फूट आई शाख पर कहना उसे
वो न समझा है, न समझेगा, मगर कहना उसे

ऐसे खूबसूरत कलाम और उसपर मेहदी हसनजी की आवाज, सचमुच ये अल्बम एक बेहतरीन पेशकश है. पेश है मेरी एक पसंदीदा गझल.

खुली जो आंख तो वो था, न वो जमाना था
दहेकती आग थी, तनहाई थी, फसाना था

गमों ने बांट लिया है मुझे यूं आपस में
के जैसे मै कोई लूटा हुआ खजाना था

ये क्या के चंद ही कदमों पे थक के बैठ गए
तुम्हे तो साथ मेरा दूर तक निभाना था

मुझे जो मेरे लहूं में डबो के गुजरा है
वो कोई गैर नही, यार इक पुराना था

खुद अपने हाथ से, 'शहजाद' उसको काट दिया
के जिस दरख्त की टहनी पे आशियाना था

2 comments:

Cosmos said...

Mujhe jo mere lahoo me dubo ke guzra
Koi gair nahi, yaar ek puraana tha

waqai kammal ka kalaam aur phir us behatreen awaaz me to in lafzon ne kahar dha diya hoga ;)

Raj said...

Sach hai, mehadi hasan ji ne kamal kiya hai.