धुंधलासा एक खयाल
कबसे दस्तक दे रहा था
कितनीही बार तो उसे भगा चुका था
तडकेसे फिर हाजिर हो जाता था
फिर एक दिन रहा नही गया
उसे अंदर बुलाया, बहोत सी बातें की
मेरा हाथ पकडकर
मुझे ले गया एक कमरे में
वहां थे कितने ऐसे चित्र, कितनीही छवियां
जो मुझे बुला रही थी
मानों कह रही हो
सोचते क्या हो, आओ हमारे साथ
खोजो हमारी इस नयी दुनिया को
देखकर उन्हें दंग रह गया मै
"की दारूण चोमोत्कार!"
सुनकर मेरी बात
वो मुस्कुराया, बोला
हर सपने की शुरूआत
मुझसेही तो होती है,
एक धुंधलेसे खयाल से
---
प्रेरणा : सत्यजित रे की ’My Years with Apu’. पाथेर पांचाली बनाते समय उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया. बहोत सी कठीनाइयोंका सामना करने के बाद पाथेर पांचाली बन पाई.
Wednesday, 28 October 2009
Sunday, 30 November 2008
बस के दुश्वार है...
बस के दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना
गिरिया चाहे है ख़राबी मेरे काशाने की
दर-ओ-दीवार से टपके है बयाबां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना
गिरिया चाहे है ख़राबी मेरे काशाने की
दर-ओ-दीवार से टपके है बयाबां होना
Sunday, 30 March 2008
गोगली
एक शहर से दूसरे शहर
एक गांव से दूसरे गांव
अब इस शहर को छोडने का वक्त भी आ गया
कहते है आजकी दुनिया एक ग्लोबल व्हिलेज बन गयी है
शायद सच भी हो
लेकिन जज्बातों की छोटीसी दुनिया का क्या?
किसी शहर से गहरा नाता जुडता है
किसी दूसरे से सिर्फ पहचान होती है
लेकिन इस के बीच घर शब्द का अर्थ कहीं छूट सा जाता है
बचपन में पढा था
गोगली अपना घर अपनी पीठ पर लेकर घूमती है
उस समय कितना अचरज हुआ था
उस समय ये कहां पता था
कि किसी दिन
हम भी इस ग्लोबल व्हिलेज की एक गोगली बन जायेंगे
अपना घर अपनी पीठ पर लिये
एक शहर से दूसरे शहर
एक गांव से दूसरे गांव
एक गांव से दूसरे गांव
अब इस शहर को छोडने का वक्त भी आ गया
कहते है आजकी दुनिया एक ग्लोबल व्हिलेज बन गयी है
शायद सच भी हो
लेकिन जज्बातों की छोटीसी दुनिया का क्या?
किसी शहर से गहरा नाता जुडता है
किसी दूसरे से सिर्फ पहचान होती है
लेकिन इस के बीच घर शब्द का अर्थ कहीं छूट सा जाता है
बचपन में पढा था
गोगली अपना घर अपनी पीठ पर लेकर घूमती है
उस समय कितना अचरज हुआ था
उस समय ये कहां पता था
कि किसी दिन
हम भी इस ग्लोबल व्हिलेज की एक गोगली बन जायेंगे
अपना घर अपनी पीठ पर लिये
एक शहर से दूसरे शहर
एक गांव से दूसरे गांव
Saturday, 15 March 2008
तनहाई
तनहाई.. मीलों है फैली हुई तनहाई
सोनू निगम की दर्दभरी आवाज
आज इस गाने के बोल
दिल के कितने करीब महसूस हो रहे थे
और क्यूं न हो
सत्ताईस मिनट हो गए
न कोई ईमेल
न कोई स्क्रॅप
ना ही एसएमएस
या चॅट
तनहाई.. मीलों है फैली हुई तनहाई
सोनू निगम की दर्दभरी आवाज
आज इस गाने के बोल
दिल के कितने करीब महसूस हो रहे थे
और क्यूं न हो
सत्ताईस मिनट हो गए
न कोई ईमेल
न कोई स्क्रॅप
ना ही एसएमएस
या चॅट
तनहाई.. मीलों है फैली हुई तनहाई
Saturday, 8 March 2008
एक बेकारसा दिन
एक बेकारसा दिन
धीमी बारिश में भीगासा दिन
गीली ठंड से सिकुडतासा दिन
काले बादलोंकी छांव में मुरझायासा दिन
तेज हवा के थपेडोंसे परेशानसा दिन
अंदर की कश्मकश से बेचैन सा दिन
अनजान मंझिलोंकी राह में
अनदेखे दिनोंकी आहट में
ग़ालिब को याद करता हुआ
एक बेकारसा दिन
धीमी बारिश में भीगासा दिन
गीली ठंड से सिकुडतासा दिन
काले बादलोंकी छांव में मुरझायासा दिन
तेज हवा के थपेडोंसे परेशानसा दिन
अंदर की कश्मकश से बेचैन सा दिन
अनजान मंझिलोंकी राह में
अनदेखे दिनोंकी आहट में
ग़ालिब को याद करता हुआ
एक बेकारसा दिन
Sunday, 24 February 2008
Sunday, 20 January 2008
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