Sunday, 6 June 2010

दमा दम मस्त कलंदर

शाहबाज कलंदर (११७७-१२७४) सूफी दरवेश थे.

बालण/बारण, बलण/बरण इन शब्दों के उच्चार मे कुछ भिन्नता है. नुसरत फते अली खां साहब बालण शब्द इस्तेमाल करते है लेकिन रूना लैला जी बारण कहती है.

कलंदर शब्द का इतिहास जानने के लिए यहां देखिए.

ओ लाल मेरी पत रखियो बला झूले लालण - २
सिंदडी दा सेवण दा सखी शाहबाज़ कलंदर
दमा-दम मस्त कलंदर, अली दम दम दे अन्दर
दमा-दम मस्त कलंदर, अली दा पहला नंबर

चार चराग तेरे बरण हमेशा - ३
पंजवा मैं बारण आई बला झूले लालण
सिंदडी दा सेवण दा सखी शाहबाज़ कलंदर

हिंद सिंद पीरा तेरी नौबत बाजे - ३
नाल बाजे घड़ियाल बला झूले लालण
सिंदडी दा सेवण दा सखी शाहबाज़ कलंदर

हर दम पीरा तेरी खैर होवे - ३
नाम-ए-अली बेडा पार लगा झूले लालण
सिंदडी दा सेवण दा सखी शाहबाज़ कलंदर

दमा-दम मस्त कलंदर, अली दम दम दे अन्दर
दमा-दम मस्त कलंदर, अली दा पहला नंबर

Monday, 24 May 2010

गीतांजली

गीतांजली की कुछ पंक्तियां.

इन पंक्तियों के लिए नोंदोनमोशाय का तहे-दिल से शुक्रिया.

चित्त जेथॉ भॉयशून्य, उच्च जेथॉ शिर
ग्यान जेथॉ मुक्त, जेथॉ ग्रिहेर प्राचीर

आपोन प्रांगाणतले दिबॉश शॉर्बॉरी
बोशुधारे राखे नाय खोंडो खुद्रो कोरी

जेथॉ बाक्य हृदयेर उच्छोमुख होते
उच्छ्वासे उठे, जेथॉ निर्बारितो स्रोते

देशे देशे दिशे दिशे कोर्मोधारा धाय
ओजोस्रो सोहोस्रोबिधो चोरितार्थोताय

जेथॉ तुच्छो आचारेर मोरुबालुराशि
बिचारेर स्रोतोपथ फेले नाय ग्राशी

पौरुषेरे कोरोनि शोतोधा नित्य जेथॉ
तुमी शोर्बो कोर्मो-चिंता-आनंदेर नेता

निजो होस्ते निर्दोय आघात कोरी पितो
भारतेरे शेई शोर्गे कोरो जाग्रतो

Tuesday, 27 April 2010

हो गयी तेरी बल्ले बल्ले

रांझा नईया हो छड दो यारी
चंगी नई ओ इष्क बीमारी
इष्क ना छड दे कुछ भी पल्ले

हो गयी तू बल्ले बल्ले
हो जायेगी बल्ले बल्ले

छड दे बिन मतलब दे ऐणे पंगिया दे विच पैणा
इष्क दा चक्कर दे विच नींद गवाके की ही लैणा
हो जावे जे प्यार ते बल्ले कुछ नई ओ रैणा
अंखियां हो जाण चार बल्ले कुछ नई ओ रैणा
हासे तेरे खो जाणें में रोणा बे बे कल्ले कल्ले

हो गयी तेरी बल्ले बल्ले
हो जायेगी बल्ले बल्ले

दो दिन होंदी यारी मगरा लासा होंदा है
कुडियां जेंवी प्यार का खेळ तमाशा होंदा है
तू जो मिल जाए यार ता फिर ए नई पुछ दे
बिक जाए घरबार ता फिर ए नई पुछ दे
जांदी दारी कै जांदे में होके सजणा चल्ले चल्ले

हो गयी तेरी बल्ले बल्ले
हो जायेगी बल्ले बल्ले

शीशे दे नाळ गल्ला करना चंगा लगदा है
हो यार दी खातिर बेजाय मरना चंगा लगदा है
हो जावे जे प्यार ते बल्ले कुछ नई रैणा
अंखियां हो जाण चार बल्ले कुछ नई रैणा
हातम तिदे गवांचे रैणा होके फिर ना चल्ले चल्ले

हो गयी तेरी बल्ले बल्ले
हो जायेगी बल्ले बल्ले

Wednesday, 28 October 2009

पाथेर पांचाली

धुंधलासा एक खयाल
कबसे दस्तक दे रहा था
कितनीही बार तो उसे भगा चुका था
तडकेसे फिर हाजिर हो जाता था
फिर एक दिन रहा नही गया
उसे अंदर बुलाया, बहोत सी बातें की
मेरा हाथ पकडकर
मुझे ले गया एक कमरे में
वहां थे कितने ऐसे चित्र, कितनीही छवियां
जो मुझे बुला रही थी
मानों कह रही हो
सोचते क्या हो, आओ हमारे साथ
खोजो हमारी इस नयी दुनिया को

देखकर उन्हें दंग रह गया मै
"की दारूण चोमोत्कार!"
सुनकर मेरी बात
वो मुस्कुराया, बोला
हर सपने की शुरूआत
मुझसेही तो होती है,
एक धुंधलेसे खयाल से
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प्रेरणा : सत्यजित रे की ’My Years with Apu’. पाथेर पांचाली बनाते समय उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया. बहोत सी कठीनाइयोंका सामना करने के बाद पाथेर पांचाली बन पाई.

Sunday, 30 November 2008

बस के दुश्वार है...

बस के दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना

गिरिया चाहे है ख़राबी मेरे काशाने की
दर-ओ-दीवार से टपके है बयाबां होना

Sunday, 30 March 2008

गोगली

एक शहर से दूसरे शहर
एक गांव से दूसरे गांव

अब इस शहर को छोडने का वक्त भी आ गया
कहते है आजकी दुनिया एक ग्लोबल व्हिलेज बन गयी है
शायद सच भी हो
लेकिन जज्बातों की छोटीसी दुनिया का क्या?
किसी शहर से गहरा नाता जुडता है
किसी दूसरे से सिर्फ पहचान होती है
लेकिन इस के बीच घर शब्द का अर्थ कहीं छूट सा जाता है

बचपन में पढा था
गोगली अपना घर अपनी पीठ पर लेकर घूमती है
उस समय कितना अचरज हुआ था
उस समय ये कहां पता था
कि किसी दिन
हम भी इस ग्लोबल व्हिलेज की एक गोगली बन जायेंगे
अपना घर अपनी पीठ पर लिये
एक शहर से दूसरे शहर
एक गांव से दूसरे गांव

Saturday, 15 March 2008

तनहाई

तनहाई.. मीलों है फैली हुई तनहाई

सोनू निगम की दर्दभरी आवाज
आज इस गाने के बोल
दिल के कितने करीब महसूस हो रहे थे
और क्यूं न हो
सत्ताईस मिनट हो गए
न कोई ईमेल
न कोई स्क्रॅप
ना ही एसएमएस
या चॅट

तनहाई.. मीलों है फैली हुई तनहाई