Sunday, 30 November 2008

बस के दुश्वार है...

बस के दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना

गिरिया चाहे है ख़राबी मेरे काशाने की
दर-ओ-दीवार से टपके है बयाबां होना

Sunday, 30 March 2008

गोगली

एक शहर से दूसरे शहर
एक गांव से दूसरे गांव

अब इस शहर को छोडने का वक्त भी आ गया
कहते है आजकी दुनिया एक ग्लोबल व्हिलेज बन गयी है
शायद सच भी हो
लेकिन जज्बातों की छोटीसी दुनिया का क्या?
किसी शहर से गहरा नाता जुडता है
किसी दूसरे से सिर्फ पहचान होती है
लेकिन इस के बीच घर शब्द का अर्थ कहीं छूट सा जाता है

बचपन में पढा था
गोगली अपना घर अपनी पीठ पर लेकर घूमती है
उस समय कितना अचरज हुआ था
उस समय ये कहां पता था
कि किसी दिन
हम भी इस ग्लोबल व्हिलेज की एक गोगली बन जायेंगे
अपना घर अपनी पीठ पर लिये
एक शहर से दूसरे शहर
एक गांव से दूसरे गांव

Saturday, 15 March 2008

तनहाई

तनहाई.. मीलों है फैली हुई तनहाई

सोनू निगम की दर्दभरी आवाज
आज इस गाने के बोल
दिल के कितने करीब महसूस हो रहे थे
और क्यूं न हो
सत्ताईस मिनट हो गए
न कोई ईमेल
न कोई स्क्रॅप
ना ही एसएमएस
या चॅट

तनहाई.. मीलों है फैली हुई तनहाई

Saturday, 8 March 2008

एक बेकारसा दिन

एक बेकारसा दिन

धीमी बारिश में भीगासा दिन
गीली ठंड से सिकुडतासा दिन
काले बादलोंकी छांव में मुरझायासा दिन
तेज हवा के थपेडोंसे परेशानसा दिन
अंदर की कश्मकश से बेचैन सा दिन
अनजान मंझिलोंकी राह में
अनदेखे दिनोंकी आहट में
ग़ालिब को याद करता हुआ

एक बेकारसा दिन

Sunday, 24 February 2008

साया

बाकी सब चले गए
वो नही गया
पलट के देखा
साया था हमारा

Sunday, 20 January 2008

फुरसत

सुकून नही मिला
मंझिलें पाने के बाद
दिल ढूंढता है फुरसत
ग़ालिब के जमाने से

Tuesday, 1 January 2008

पहेली

रास्ते में आते जाते
मुस्कुराते है लोग
न जाने हम पर
या हमारे हालात पर